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संपादकीय
किसान व्यापारी नहीं है
भारत
वर्ष में किसानों की आत्महत्या करने पर पूरा देश पिछले कई वर्षों से गहन चिंतन
कर रहा है। लेकिन किसानों की आत्महत्या करने का दौर रुकने का नाम ही नहीं ले
रहा है। इसके जड़मूल में अध्ययन करने पर यही बात समझ में आती है कि किसानों का
आत्महत्या करने का सबसे बड़ा कारण उसकी सोच में आई वाणिज्य प्रवृति है। अब वह
कर्ज लेकर फसल उगाते हैं। इससे भारत का किसान भी अपरोक्ष रूप से किसी उद्योग
में काम करने वाला मजदूर हो गया है। जिसके हिस्से में मुनाफा तो कम ही आता है
लेकिन हानि पूरी तरह से उसके हिस्से में आ जाती है जो उसे आत्महत्या करने पर
विवश कर रही है। किसानों को एक बार फिर अपने पुराने रूप में आने की जरूरत है।
देश के लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। हैरानी की बात यह है कि किसान
भुखमरी, गरीबी और कर्ज के कारण आत्महत्या कर रहे हैं। यहां गौर करने लायक बात
यह है कि हिमाचल और उत्तराखंड के किसान भारी गरीबी होने के बावजूद आत्महत्या
नहीं कर रहे हैं। देश भर के किसानों को हिमाचल और उत्तराखंड के किसानों से बड़ा
सबक सीखना चाहिए। आत्महत्या करने और आत्महत्या न करने वाले प्रांतों के किसानों
में सबसे बड़ा अंतर यही महसूस किया जा रहा है कि जिन प्रांतों के किसानों ने
अपनी पुरानी परंपराओं की जीवित रखा है उन्हें कभी भी आत्महत्या करने जैसी बात
को सोचने की जरूरत ही नहीं पड़ती है। वह भंयकर अकाल में भी खुद को और अपने आसपास
के लोगों को जिंदा रखने की ताकत रखते हैं।
पहले किसान की खेती करने का ढंग निराला था। वह पहले अपने लिए वर्ष भर का राशन
जमा करता था। साथ ही वह घर में ब्याह शादी और अन्य समारोह के लिए अनाज को बचा
लेता था। इसके बाद जो बचता था उसका एक हिस्सा वह कुम्हार, सुनार, जुलाह व गांव
के अन्य कमजोर तपके के लोगों को बांट दिया करता था। इसके बाद भी उसके पास जो
अनाज बचता था वह उसे देश की मंडियों में बेच देता था। इस परंपरा से वह जहां
अपने आसपास के लोगों को भुखमरी से बचाता था वहीं देश में भी भुखमरी न फैले इसके
लिए जीतोड़ मेहनत करता था। उसे भविष्य में फसल खराब हो जाने पर भूखा न मरना पड़े
इसके लिए वह कुल्थ, कोदे और बाजरे की फसल भी उगाता था। कहते हैं कोदे को 100
साल भी स्टोर में रखा जाए तो वह खराब नहीं होता है। कोदे को अकाल का अनाज कहा
जाता है। जब किसान की फसल तबाह हो जाती थी तो वह अकाल का अनाज निकाल कर अपना
पेट भर लेता था।
इसी परंपरा पर चलने वाले किसान को ‘जय जवान’ कहा जाता था। जिसकी कभी पराजय नहीं
हो सकती थी। अब किसान बैंकों से कर्जा लेकर फसल उगाता है। फसल खराब हो जाने पर
उसे सरकार की आर्थिक सहायता की दरकार रहती है। किसानों को अपनी सोच में वाणिज्य
को बाहर निकालकर चलने की जरूरत है। उन लोगों से बचने की जरूरत है जो किसान को
बंधुआ मजदूर बनाना चाहते हैं। उसे अपना पेट भरने के लिए अनाज भंडार रखना होगा,
फिर दूसरों के लिए अनाज भंडार बढ़ाना होगा। |