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फिल्‍म इंडस्ट्रिज पर विशेष

फिल्‍मों में आने से पहले ज्‍यादा हेंडसम थे धर्मू

प्रस्‍तुति : संजय हिंदवान

     वर्ष 2025 भारत के सिनेमा जगत के लिए काफी दुखद रहा। इस वर्ष में भारतीय सिनेमा का सबसे स्मार्ट हीरो धर्मेन्द्र देयोल को हमने खो दिया। उन्हें श्रद्धांजलि स्वरूप हम यह लेख आम लोगों के लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। इस लेख में उनसे जुड़ी वह यादें हैं जो शायद कभी सिनेमा प्रेमियों के सामने नहीं आई हैं।
     बात वर्ष 1954 की है जब धर्मेन्द्र मलेरकोटला में एक टयूबवैल कंपनी में काम करते थे। इस कंपनी का नाम ‘हैरल्ड स्मिथ’ था जिसे पंजाब में हरित क्रांति लाने के लिए तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. जवाहर लाल नेहरू से ठेका दिया था। धर्मेन्द्र तब इस कंपनी में मेरे पिता स्वर्गीय रास बिहारी शर्मा के साथ टयूब्वैल लगाने और उसकी जांच करने का काम किया करते थे। हलांकि कंपनी में बहुत से अन्य कर्मचारी भी थे लेकिन पिता जी के साथ उनकी अच्छी दोस्ती थी। इसका कारण शायद यह रहा होगा कि मेरे पिता रंगमंच के अच्छे कलाकार थे और धर्मेन्द्र जी को फिल्मों का भारी जुनून था। यह जुनून इस कदर था कि वह दलीप कुमार की फिल्म देखने मलेरकोटला से अंबाला साइकिलों पर भी जाया करते थे।
     ड्यूटी के बाद दोस्तों में फिल्मी बातें होती थी। यहां उनकी उस टायरी का एक पन्ना प्रस्तुत कर रहा हूं। जिसमें धर्मेन्द्र ने अपनी एक काल्पनिक फिल्म का पोस्टर रंगीन पैंसिलों से बनाया थे। उन्होंने अपनी कल्पना में फिल्म का नाम ‘टयूबवैल’ रखा था। जिसमें उन्होंने फिल्म की कास्ट (फिल्म में काम करने वाले अपने मित्रों) के नाम भी लिखे थे। इसे उन्होंने ‘ए थ्री फ्रेंडस प्रोडक्शन’ अपनी कल्पनाओं में बनाने का प्रयास किया था। इसे अलावा उन्हेंाने खाली समय में इसी डायरी में कुछ और रंगीन पैंसिल से पोस्टर भी बनाए थे। कहने का अर्थ यह है कि धर्मेन्द्र में फिल्मों का ऐसा जुनून था कि वह ज्यादातर समय फिल्मों की ही बातें किया करते थे। मेरे पिता रास बिहारी शर्मा जो सोलन (हिमाचल प्रदेश) के रहने वाले थे ने ही धर्मेन्द्र की पहली तस्वीर अपने कैमरे से खींची थी। आज से 72 वर्ष पूर्व कैसा कैमरा रहा होगा इसका अंदाजा सोलन और मलेरकोटला (पंजाब) में बैठे लोग आसानी से लगा सकते हैं। यह दोनों चित्र भी इस आलेख के साथ छाप रहा हूं जो शायद उनके जीवन के पहले चित्र होंगे।
     मेरे पिता स्वर्गीय रास बिहारी शर्मा का निधन 19 जुलाई 2019 में हो गया था। धर्मेन्द्र जी का निधन 2025 के जाते जाते 24 नवंबर 2025 को हो गया। हमारे घर में धर्मू अंकल के चरचे अक्सर होते रहते थे। हम उन्हें घर में धर्मू अंकल कहकर ही संबोधित किया करते थे। पिता जी भी उनसे जुड़ी बातें हमें सुनाते रहते थे। बड़े हीरों बनने के बाद एक बार जब धर्मेंद्र शिमला आए तो पिता जी उनका पीछा करते हुए पटियाला तक स्कूटर पर ही चले गए, पर मुलाकात नहीं हुई। मुंबई से जब उनका कोई दोस्त धर्मू अंकल से मिलकर आता था तो उनका दुआ सलाम पिता जी को मिल जाया करता था। मलेरकोटला से सलीम अंकल ही अक्सर पिता जी से मिलने आया करते थे। हम भी उनके साथ बैठकर धर्मू अंकल के चर्चे बड़ी उमंग के साथ सुना करते थे।
     जब धर्मू अंकल ने बीकानेर से चुनाव लड़ा तो सलीम अंकल ने मोबाइल पर धर्मेन्द्र जी से बात करवाई। दुर्भाग्य यह रहा कि पिता जी उस समय घर पर नहीं थे और मैंने ही धर्मू अंकल से बात की। धर्मू अंकल ने इतना ही कहा कि ‘किथे है तेरा पापा’ मैंने जवाब में कहा ‘वह बाजार गए हुए हैं’। फिर धर्मू अंकल ने कहा कि ‘ओनू कहीं, मैं ओनू बहुत याद कर रेहा सी’। इससे पहले एक बार पिता जी मुंबई धर्मू अंकल से मिलने गए थे। वहां वह मेरे पत्रकार दोस्त कमल के घर में भी रुके थे। तब धर्मू अंकल काशीपुर में थे।
     यूं तो धर्मेन्द्र शादीशुदा थे और पंजाब के सानेवाल के रहने वाले थे, पर टयूबवैल कंपनी में काम करते हुए वह ज्यादातर मलेरकोटला और नाभा में ही किसानों के लिए टयूबवैल लगाने के कार्य में व्यस्त रहते थे। कहा जा सकता है कि पंजाब के इस भाग में हरित क्रांति लाने में मेरे पिता और धर्मू अंकल जैसे लोगों का भी योगदान रहा है। पिता जी बताते थे कि वहां उस समय ऐसे हालत थे कि लोगों को पीने का पानी लेने भी काफी दूर जाना पड़ता था। बल्कि काम के दौरान यदि किसी से पानी मांगा जाता था तो वह कह देता था कि पानी लेने तो कुएं में जाना पड़ेगा। कई बार तो पिता जी धर्मू अंकल के लिए मोहन मीकिन्स की ‘सोलन न. 1’ बोतन लेकर भी जाते थे तो धर्मू अंकल कह देते थे कि ‘पानी दी की लोड, एदां ही चलुगी’। लेकिन जब यहां ट्यूबवैल लगा दिए गए तो यहां के मीलों लंबे खेत सरसों से लहलाह उठे थे।
     आज जब पिता जी भी इस दुनियां में नहीं हैं और धर्मू अंकल भी कुछ दिनों पहले ही इस दुनियां को अलविदा कह चुके हैं। ऐसे में मैं यह लेख लिख रहा हूं, जब इसे पढ़ने के लिए न पिता जी हैं और न ही उनके दोस्त धर्मू अंकल। मुझे यकीन है कि यदि वह जिंदा होते तो इस लेख को पढ़कर बहुत खूश होते और खास तौर से धर्मू अंकल की यह 72 साल पुरानी फोटो को देखकर। अब इस कहानी का एक मात्र जीवित गवाह धर्मू अंकल की पत्नी श्रीमती प्रकाश कौर ही हैं। सन्नी दयोल उस समय पैदा हो गए थे जब धर्मू अंकल ‘हैरल्ड स्मिथ’ कंपनी में काम करते थे। मेरे पिता जी तब कुअंरे थे और धर्मू अंकल की शादी हो चुकी थी। बाद में धर्मू अंकल मुंबई के लिए निकल पड़े और पिता जी सोलन लौट आए। धर्मू अंकल फिल्मों में भाग्य आजमाने लगे।
     एक बात और बता दूं धर्मू अंकल की पहली फिल्म ‘ब्वाय फ्रेंड’ थी जिसका खूब शोर उनके दोस्तों में मचा। सब इंतजार करते रह गए लेकिन फिल्म रिलीज नहीं हुई। फिर ‘दिल भी तेरा हम भी तेरे’ और ‘बंदनी’ के बाद तो धर्मू अंकल ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इसके बाद की कहानी तो पूरी दुनियां जानती है। धर्मू अंकल शानदार अदाकार ही नहीं शानदार इंसान भी थे। जब उनसे मिलने वाले हमारे परिचित लोकेश ने कहा कि सोलन में आपके एक दोस्त थे। तो धर्मेन्द्र से उन्हें टोकते हुए कहा कि ‘दोस्त थे नहीं दोस्त हैं’।

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