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शिमला का 13 किलोमीटर लंबा रोप वे प्रोजेक्ट
खटाई में पड़ा
अब 20 फीसदी हिस्सेदारी तय होगी कैबिनेट
में...
निजी संवाददाता
शिमला
: बहुचर्चित शिमला का रोप वे प्रोजेक्ट खटाई में पड़ गया है। इसकी लागत
लगभग डबल होने पर भारत सरकार से क्लियरेंस तो आ गई थी लेकिन अब उपमुख्यमंत्री
मुकेश अग्निहोत्री ने इस प्रोजेक्ट पर स्टेट शेयर को लेकर पहले वित्त विभाग से
गारंटी लेने को कहा है। इससे लगता है कि प्रदेश सरकार की इसमें सांसें फूल गई
हैं। इसका सबसे बड़ा कारण है हिमाचल प्रदेश की आर्थिक कंगाली।
इस प्रोजेक्ट को बाह्य वित्त पोषण के जरिए एनडीबी यानी ब्रिक्स बैंक फंड कर रहा
है लेकिन 80 और 20 फीसदी हिस्सेदारी के कारण राज्य सरकार पर जो लागत 388 करोड़
पुराने टेंडर से बन रही थी वह बढ़कर 540 करोड़ हो गई है। इसलिए उप मुख्यमंत्री
ने रोपवे ट्रांसपोर्ट काॅरपोरेशन से कहा है कि वह पहले वित्त विभाग से स्टेट
शेयर पर गारंटी ले ले। वित्त विभाग के पास इस तरह के प्रोजेक्ट में पैसा देने
के लिए परिस्थितियों बनेंगी या नहीं, यह फाइल पर ही पता चलेगा। इस पर अंतिम
फैसला कैबिनेट में ही होगा।
करीब 13.79 किलोमीटर लंबे इस रोपवे की लागत पहले 1556 करोड़ थी, जो अब बढ़कर
2980 करोड़ हो गई है। तीन बार टेंडर करने के बाद इसके लिए आस्ट्रिया की एक
कंपनी आगे आई थी। सिंगल टेंडर पर भारत सरकार की राय लेने के लिए हिमाचल सरकार
ने इसे वित्त विभाग के आर्थिक मामले विभाग को भेजा था। वहां से जवाब आया है कि
यदि राज्य सरकार प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ाना चाहती है तो उन्हें कोई आपत्ति नहीं
है। प्रोजेक्ट की लागत बढ़ने का सबसे बड़ा रुपए का यूरो के मुकाबले अवमूल्यन
है। यह रोपवे प्रोजेक्ट पिछले करीब 4-5 वर्षों से विभिन्न प्रक्रियाओं में उलझा
हुआ है। हलांकि इसकी खूब ढींगे प्रदेश सरकार से जनता के बीच मारी थीं।
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